गुरुवार, 12 जनवरी 2017

ख्वाहिशें पाल मत यारां , कोई ग़ालिब नहीं है तू – हज़ारों ख्वाहिशें हों और, हर ख्वाहिश पे दम निकले ?


गिरह खोली गिने हमनेहमारे गम भी कम निकले
नमी क्यों आपकी आँखों में मेरे गम,  तो सनम निकले .
   
रोज़ बातें अंधेरों की,  फसानों के बड़े किस्से -
खौफ़ खाके जो तुम निकलेउसी दहशत में हम निकले .

किसी शफ्फाक गुंचे पेयकीं बेहद नहीं करना 
सिपाही कह रहे थे – “गुंचों में कई बार बम निकले ..!!”

लूट लाए थे मुफलिस, दुकानें आज कपड़ों की   
बाँट पाए न आपस मेंसभी के सब कफ़न निकले !!

ख्वाहिशें पाल मत यारां , कोई  ग़ालिब नहीं है तू 
हज़ारों ख्वाहिशें हों और,  हर ख्वाहिश पे दम निकले ?
                         *गिरीश बिल्लोरे मुकुल”*

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