रविवार, 26 अक्तूबर 2014

पहले ही तरल हो... मिल जाता हूं.. कुछ इस तरह

अक्सर जब पिघलने लगता हूं..
तो रिसता भी हूं...
रिसते रिसते ... हौले हौले ...
तरल होकर सरकता हूं...
ढलान की तरफ़ .........
जो शनै: शनै: गहराई का आकार लेती है...
उसी ढलान के बाद वाली गहराई में डूबने उतराने लगता हूं.. 
डुबकियां लगाता मैं..
तुम्हारी प्रीत की अतल गहराईयों.. में
थाह नहीं पा रहा हूं.. 
फ़िर तुममें...
तुम जो 
पहले ही तरल हो...
मिल जाता हूं.. 
कुछ इस तरह 
हां.. 
इसी तरह मैं..कि
अपना अस्तित्व भूल 
तुममें खुद को पाता हूं..
यही प्यार है..  

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