शुक्रवार, 1 मार्च 2013

प्रीत को रंग लगै हूं प्रिय को, लाख जतन से छूट न पाए !!



फ़ागुन में सब भूल गई री, जो गुन तैने मोहे  सिखाए !
जो देखी  छब   प्रिय की मैने , रीझो तन अरु मन अकुलाए !!
रंग गुलाबी, पीरो नीरो, लाल, हरो मोहे अब न भाए-
प्रीत को रंग लगै हूं प्रिय को, लाख जतन से छूट न पाए !!
प्रीत की विजया ऐसी नशीली, मद जाको  तन से न जाए -
तन से जाए जो मद ऐसो, मन में जाके आग लगाए !!

**********************

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणियाँ कीजिए शायद सटीक लिख सकूं