मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

सुना है शाह बेखबर है नीरो के जैसा


रोज़िन्ना शाम  
वो चहचहाते थे
टहनियों पे...!
खूब मस्ती भी करते थे परिंदे
कभी डपटा पीपल ने नहीं उनको
पड़ौसी आम को भी शिकायत नहीं की उनसे ...!
परिंदे जब रात को
बिल्ली की आमद जान लेते जब
एक सुर में चीखते चिल्लाने लगते थे
जिसे सुन बिल्ली भाग जाती !
किसी घर की खुली खिड़की से
चुपचाप घुस कर कुछेक चूहे या फ़िर
दूध बच्चों का चुराती..!!
रोज़िन्ना शाम  
चहचहाने वाले उन परिंदों का मैं आदी हूं -
मेरी कविता में अनोखे शब्द भरने वाले परिंदे
मेरे आंगन की सही पहचान करने वाले परिंदे  
आज़ की शाम लौटे नहीं हैं
पत्तियां पत्तियों से लड़ रहीं हैं
टहनियां बेसुधी में  हैं .. घौंसलों में सभी अंडे
दरक के बह निकले...  
वो मस्तैली चिरकुट बिल्ली मुहल्ले की
रात भर रोती रही फ़िर फ़िर के
सभी सदमें में हैं
बिल्ली, पत्तियां, टहनियां और मैं
तुम जानते हो
रात पिछली दरिंदों ने 
छिपाके बारूद रक्खा था उसी पेड़ के नीचे
सुबह स्कूल वाले कुछ बच्चे , मोची, पेप्पोरवाला
खबर ऐसी ही रोज़िया चैनल पे चली दिन भर
सुना है शाह बेखबर है नीरो के जैसा
उसको परिंदों,पीपल,बिल्ली, मोची, बच्चों,  पेप्पोरवाले
के बीच का रिश्ता नही मालूम !
कभी उसने मेरी कविता पढ़ी होती
तो वो जानता कि
बिल्लियां क्योंकर रोतीं 

1 टिप्पणी:

  1. बहुत उम्दा ..भाव पूर्ण रचना .. बहुत खूब अच्छी रचना इस के लिए आपको बहुत - बहुत बधाई
    मेरी नई रचना
    ये कैसी मोहब्बत है
    खुशबू

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