रविवार, 13 मई 2012

जेब से रेज़गारी जिस तरह गिरती है सड़कों पे तुमसे प्यार के चर्चे कुछ यूं ही खनकते हैं....!!


उजाले उनकी यादों के हमें सोने  नहीं देते.
सुर-उम्मीद के तकिये भिगोने भी नहीं देते.
तुम्हारी प्रीत में बदनाम  गलियों में कूचों में-
भीड़ में खोना मुश्किल लोग खोने ही नहीं देते.
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जेब से रेज़गारी जिस तरह गिरती है सड़कों पे
तुमसे प्यार के चर्चे कुछ यूं ही खनकते हैं....!!
हुदूदें तोड़ कर अब आ भी जाओ हमसफ़र बनके 
कितनी अंगुलियां उठतीं औ कितने हाथ उठते हैं.?
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3 टिप्‍पणियां:

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