मंगलवार, 10 जनवरी 2012

अब सच तुमको चाहने लगा हूं

तुम तुम्हारी पीर
मेरी कब हो गई सच
अचानक ...
तुम से मिलकर बेतहाशा खुश हूं पर
जानता हूं
तुम उदासी को मुस्कुराहट
के दुशाले में ढांक लेती
किसी से कुछ भी नहीं कहती
चुपचाप
अपलक छत को निहारती देर रात तक
जूझती हो
व्योम के उस पार
तक देखतीं तुम मुझे अक्सर
दिख ही जाती हो
जानता हूं
फ़िर खुद से पूछता हूं कि
क्यों रुक गया तुम्हासी रेशमी आवाज़ सुन कर
तुम्हारे इर्द गिर्द
एक
वलय बन के क्यों घूम रहा हूं
जो भी हो व्योम के पार का तुमसे मेरा भी आभासी नाता ज़रूर है
क्योंकि
सच अब हम अनजाने नातों में बंध गये हैं
शायद


9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत बढ़िया!
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. बहुत ही प्रेममय प्रस्तुति ।
    मेरी नई कविता देखें । और ब्लॉग अच्छा लगे तो जरुर फोलो करें ।
    मेरी कविता:मुस्कुराहट तेरी

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  3. किसने मना किया चाहने से, कौनो कर्फ़्यु लगा है? :))

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  4. Bahut hi sundar rachna.....
    Dr. Sahiba dusre blog mein aapne kafi din se kuch nahi likha h. Maf karna man mein utsukta thi esliye puch liya.

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  5. बस अब कुछ कहने को बाकी न रहा
    दिल के ज़ज्बातो को आपने शब्द दे दिए




    विजय

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