गुरुवार, 27 अक्तूबर 2011

प्रेम पत्र के साथ गुज़ारा कब तक करूँ कहो तुम प्रियतम ?

आभार सहित : सहयात्री
प्रथम प्रीत का प्रेमपत्र ही
सिहरन धड़कन का कारन अब
नयनगंग की  इन  धारों को
लौट के देखा तुमने है कब
प्रेम पत्र के साथ गुज़ारा
कब तक करूँ कहो तुम प्रियतम
****************
हुई हुलासी थी तुम जब तुमने
प्रेमपंथ की डोर सम्हाली
कैसे लुक-छिप के मिलना है
तुमने ही थी राह निकाली
जब-तब अंगुली उठी किसी की
थी तुमने ही बात सम्हाली !
याद करो झूठी बातों पर
हम-तुम बीच हुई थी अनबन...!
प्रेम पत्र के साथ गुज़ारा
कब तक करूँ कहो तुम प्रियतम
*****************************
आज विरह का एकतारा ले
स्मृतियों के गलियारों से
तुम्हें खोजने निकल पडा हूँ 

अमराई में कचनारों  में
जब तक नहीं मिलोगे प्रिय तुम
सफ़र रहेगा अंगारों में
इस यायावर जीवन को भी
कोई तो देगा मन-संयम
प्रेम पत्र के साथ गुज़ारा
कब तक करूँ कहो तुम प्रियतम

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर भाई गिरीश ,...
    कहाँ विरह मन डूब रहे हों ,
    लिख-पढ़ कर भी ऊब रहे हों ,
    आज नहीं , कल फिर आओगे
    जैसे लोट के बुधू घर को आये

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  2. ऊपर वाला हमेशा हम सबके साथ रहता है
    जगाता, सुलाता खाता-पचाता ये विश्वाश रहता है
    जब तक साथ रहता है सांसों-सांस रहता है
    यदि वो घर छोड़ दे तो, सिर्फ हाड़-मांस रहता है ....

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  3. is virah ko samajhane virahee bano
    बसंत दुनियावी विरह से हट के सोचो तो ज़रा भाई

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  4. बहुत सुन्दर!
    दीपावली, गोवर्धनपूजा और भातृदूज की शुभकामनाएँ!

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