सोमवार, 26 सितंबर 2011

भ्रूण तक पहचानने मुझको न आना- ये परीक्षा और अब मैं न सहूंगी..!!


तुम्हारी हर वेदना को कम करूंगी
हां, तुम्हारे हौसलों में दम भरूंगी
उफ़ ! परीक्षा जन्म से मेरी ही क्यों ?
मैं हूं दुर्गा भय तुम्हारे मैं हरूंगी .

आख़री सांसों तलक झांसी न दी
बनके मीरा विष पिया फ़िर भी मैं जी.
बनी सीता अग्नि से मिल आई मैं
तुमने जितनी चाही परीक्षा मैने दी .
भ्रूण तक पहचानने मुझको न आना-
ये परीक्षा और अब मैं न सहूंगी..!!
      तुम्हारी हर वेदना को कम करूंगी

9 टिप्‍पणियां:

  1. कल 27/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! यदि अधिक से अधिक पाठक आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  3. pahli bar aapke blog par aai hoon bahut achcha laga.jud rahi hoon aapke blog se tatha apne blog par aamantrit bhi kar rahi hoon.

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  4. बहुत ही मार्मिक और हृदयस्पर्शी ..

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  5. मैं हूं दुर्गा भय तुम्हारे मैं हरूंगी....

    सार्थक... मर्मस्पर्शी...
    सादर...

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  6. बहुत ही मार्मिक और हृदयस्पर्शी ..

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