शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

प्रेम जो देह से ऊपर प्रेम जो ह्रदय की धरोहर

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  प्रेम की पहली उड़ान है
 तुम तक मुझे बिना पैरों 
के ले  आई..!
तुमने भी था स्वीकारा मेरा न्योता
वही  मदालस एहसास
      होता है साथ    
तुम जो कभी कह न सकीं
  मैं जो कभी सुन न सका
उसी प्रेमिल संवाद की तलाश थी
                                                          प्रेम जो देह से ऊपर
                                                      प्रेम जो ह्रदय की धरोहर  
उसे संजोना मेरी तुम्हारी जवाबदारी 
 नहीं हैं हम पल भर के अभिसारी 
उन दो तटों सी जी साथ साथ रहतें हैं 
बीच  उनके जाने कितने धारे बहते हैं 
अनंत तक साथ साथ 
होता है  मिलने का विश्वास 





5 टिप्‍पणियां:

  1. दो तटों का यह बिम्ब बेहद खूबसूरत है भाई । जाने कितने पल इनके बीच उपस्थित हैं ।

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  2. समझ में तो आ रहा है, पर लिखूं क्या, मेरे शब्द असमर्थ हैं

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  3. प्रेम की पहली उड़ान है
    तुम तक मुझे बिना पैरों के ले आई..!
    रहा नहीं न गया...........
    आखिर आ गई न ऊंटनी पहाड़ के नीचे
    दो किनारों की खूबसूरती को निहारने
    सादर
    यशोदा

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