सोमवार, 1 नवंबर 2010

अंतिम कविता 02 : तुम खूबसूरत हो

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मुझे मालूम है जाना है मुझे
जीवन अब महा मिलन की ओर
मुझे जाना ही होगा 
पूरे उत्साह से जा रहा है.
अपने अंतस में निर्वात पा रहा है....
कल जो आग के एक शरारे से तन दहक जाता था
  उसी आग की  मुखाग्नि
  और होगा  

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एक वेदना का अंत
पीछे बिसुरते चेहरे
शोक होगा अनंत
तब जब कोई मुझे तलाशेगा
कोई किताबों में
कोई अंतरजाल पर
कोई बच्चा जिसे चूमा था
वो अपने गाल पर
वो बहाने जिनने कोहनी ताख बांधी थी राखियाँ
वो दोस्त जिनने खाई थी झूठी साखियाँ
वो गिरगिट से रंग बदलते
लोग
वो पल भर में बदलते ऊपर के लोग
सब यहीं मुझे खोजेंगे
उनकी इस तलाश में शामिल रहूँगा
अभी उनसे कुछ न कहूंगा
अपने पीछे छोड़ जाउंगा बहुतेरे सवाल
कुछ दर्शन का पाथेय होगें
कुछ पर होंगे बवाल
जी तब आभासी दुनियाँ के लोग
शोक मनाएंगे
जी इसी कविता को सबूत बनाएंगे
और  में नि:शब्द रहूंगा तब
 मेरा जीवन बोलेगा
हर बात में कोई न कोई सवाल घोलेगा
उसे मिल जाएगी ""पाप-पुण्य" की परिभाषा
वो जिसे मैने सर दिया बैठने
वो जिसके अस्तित्व को स्वीकारा
वो जिसके पिता को बचाने देह से निकाला खून
हाँ वही जिसने दु:ख देकर
उससे ज़्यादा जलाया मेरे पिता का खून
उन सबको आखरी प्रणाम
मेरा अंत उन्ही सम्भ्रान्तो के नाम
दीदी  भूखे नंगे पिता के नेत्र हीन बच्चे मंगल का ध्यान रखना
जिसे हम काल के गाल से निकाल कर लाए थे
उन तुलसी के विरवों को जिन्हैं गांव-गांव लगवा कर आए थे.
सुनो दोस्त सच कहना मेरी आदत है
इसा को सूली पर भेजना तुम्हारी फ़ितरत है
कोइ दोष नहीं तुम्हारा
शायद घुट्टी तुम्हारी मां ने न बनाई होगी.
बहुत दर्द भोगा है
क्या तुम मेरी मुस्कुराहट बांच नहीं पाये
खैर तुम्हारे नाम नही लिख रहा हूं
महामिलन मेरी नियति है
तुम तो बस साधन हो
उन नेह निवालों की सौगंध
तुम्हैं उनका स्वाद
होगा ही याद
अंतिम बार खाने ज़रूर आना
मेरी देह के सामने अपनी विजयी देह ज़रूर लाना
मुझे महा-मिलन में भी साथ चाहिये तुम हां केवल तुम
तुम जो कायर थे जो भयातुर थे षड़यंत्री थे
फ़िर भी एक बीमार बाप के बेटे हो
बच्चों के पिता हो
तुमको माफ़ करना ज़रूरी है
तुम क्या जानो तुमने क्या किया
मासूम भी तो पाप कर लेते है
मुझे तुमको सबको माफ़ करना है
यही तो इसा ने किया था
राम ने भी कृष्ण ने भी
उस अदालत को भी माफ़ करता हूं जो तुम्हारी वज़ह से इल्ज़ाम लगा रही है
मेरे अस्तित्व को तुम्हारे साथ लेकर मिटा रही है
तुम क्या पूरी दुनिया मुझे मिटाने का सामर्थ्य खो चुकी है
चेतना संवेदना सब कुछ दुनिया से खो चुकी है
तुमने शिखर देखे कहां हैं
मैने जिनको पल में पार किया है
इन बैसाखियों से जिसमें शक्ति उसने दी जिससे मेरा महा मिलन होना तय है
इस दीवाली तुम्हारी शुभ कामनाएं चाहिये महा मिलन के लिये
मुझसे घृणा करने वालो
स्वागत है तुम्हारा उनसे अधिक जो मुझसे नेह करते हैं

8 टिप्‍पणियां:

  1. बस, कविता के रुप में ही लिया इस गहन अभिव्यक्ति को...

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  2. इतनी भावपूर्ण अभिव्यक्ति को अन्यथा लिया ही नहीं जा सकता..... अच्छी लगी रचना

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  3. इस कविता को कविता के रूप में रहने दें तो भी,कुछ अकुलाहट, देर तक अंतर्मंथन किये बिना नहीं रहती .

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