मंगलवार, 20 जुलाई 2010

अनुगूंज अन्तस की :- हां मुझे तुमसे प्यार है.....!

[motherandchild1.jpg](चित्र साभार ब्लाग क़त क़तरा ज़िन्दगी से )प्रेमोदघोष  करता हुआ वो युवक जाने किससे बात कर रहा था . किसी को भी इस बात की जानकारी न थी, कि वो बीमार है जी हां  कुछ लोग इस  फ़टेहाल युवक को  पागल कह रहे थे  तो कोई अनदेखा करके चला गया. ऐसा तो रोज़िन्ना होता है  बड़े बड़े शहरों के लिये ये एक छोटी सी बात थी. दूर खड़ा मैं भी इस उहापोह में था कि इस इंसान को किससे प्यार है. ? पता चल जाये तो कुछ करूं मैं. 

 हां मुझे प्यार है था और रहेगा तुमसे 
कैसे कहूं........?
तुम जानना चाहती हो न कि मैं तुमको कितना चाहता हूं ? 
 सच कहूं अपने से भी ज़्यादा पर बस आगे कुछ मत पूछना . पूछोगी तो भी न बताउंगा..... कितना प्यार है तुमसे ........? अरे प्यार की कोई सीमा ही नहीं होती है, बस तुमसे प्यार है इस बात का ऐलान किये देता हूं. तुम जानो न जानो मानो न मानो पर बात साफ़ सुथरी है कि मुझे तुम बेहद अच्छी लगती हो. जब से तुम मिली हो तब से ही लगातार जारी है मेरी प्रीत साधना. तुमने शायद ही महसूस किया होगा किया होगा तो भी तुमने कभी बताया भी नहीं है न ?   
सुनो..! बार बार मत पूछो बिना लाग लपेट के कह दिया न कि मुझे सिर्फ़ और सिर्फ़ तुमसे प्यार है. 
पर पता कैसे करूं सड़क पर तड़पता वो युवक किसी की नज़र में ड्रग एडिक्ट था. तो किसी की नज़र में लम्बे समय का बीमार. सबको पुलिस का इंतज़ार था. मेरे पास खड़ा डाक्टर ऐसा चुप चाप खड़ा था गोया उसके कान मं शीशा पिघला हो. मैने पू्छना चाहा भी था एक बार ” डा’क्साब कुछ कीजिये.....? वे घूर कर देखने लगे गोया खा जावेंगे सो मैं भी चुप. थाने को कई बार बताया जा रहा था हर बार एक ही आवाज़ :-”टी आई सा’ब फ़ील्ड पे हैं वायर लैस किया है पहुंचते ही होंगे”
ठीक एक घण्टे बाद पुलिस आई बिना किसी सम्वेदना के हवलदार बोला मरा तो नहीं. ? हम आ गये हैं....? वे अपने आप को सुषेण वैद्य समझ रहे थे  लोगों को  यमदूत ही लगे थे.  पुलिस के आते आते वो मर चुका था . पंचनामे की ग़रज़ से पुलिस ने देह की खाना तलाशी कर जो बरामद किया उसमें घड़ी,पर्स,रेल का पास,और एक कविता काग़ज़ पर लिखी हुई.....
ज़िंदगी,
मुझे तुमसे प्यार है है 
मैं तुमको चाहता हूं जीना ?
एक बिन्दास तरीक़े से जैसा वो जीते हैं जिनके
पास सब कुछ है...? 
मैं अकिंचन बस  हूं...
मेरा अस्तित्व बस एक 
मैले कुचैले दागदार कुर्ते सा ?
बेक़ार और आवारा होने के बड़े-बड़े धब्बे लगे हैं मुझ पर !
                                             थानेदार ने हवलदार की बनाई फ़ेहरिश्त पर कुछ लोगों दस्तख़त लिये . डाक्साब ने भी दस्तखत किये डाक्टर..................... थानेदार ने पूछा ”साहब आप इसका इलाज़ कर देते ?”
”डाक्टर सा’ब बोले:- भाई लाओ दस्तख़त भी काटे देता हूं...!”
और उधर मां की गोद में नवज़ात शिशु सा  युवक का शव निश्पृह निर्दोष अगली यात्रा पर दिखाई दे रहा था मुझे 


    

10 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद मार्मिक..कविता कहीं गहरे चोट कर रही है.

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  2. सुन्दर भावाभिव्यक्ति एवं सहज बोध कराती रचना, धन्यवाद गिरीश जी।

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  3. क्या लिख जाते हो गिरीश भाई ...मन कैसा कैसा हो गया ।

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