गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

दिलों को जीतने का शौक :जीतने का हुनर भी

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प्रियराज यानी गिरीराज किशोर शर्मा   एक अनोखी जिंदादिल ज़िंदगी जीते नज़र आ रहे हैं  सपत्नीक व्यक्तिगत यात्रा पर बरतानियाँ गए शर्मा जी की धर्म पत्नी  स्वर्गीय श्रीमती शकुन्तला जी  ब्रेन हेम्ब्रेज होने से 14 नवम्बर, 2005 को  इस दुनियाँ को छोड़ कर चलीं गईं प्रियराज़ की जिन्दगी नें उनको अवसाद में डुबो दिया हौले हौले ज़िंदगी ने फिर रफ़्तार पकड़ी और आज वे हम सबके बीच  एक रूमानी कवि के रूप में हैं उनके ब्लॉग का नाम है 'दिलों को जीतने का शौक ' मेरी नज़र में दिलों को जीतने का हुनर भी है उनमें 



 

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