शनिवार, 14 नवंबर 2009

बस यही है प्रेम तपस्या तापसी


तुम जो परिधि लांघना चाह के रुक जाती हो
      अन बोले सवालों के  जवाबों की प्रतीक्षिता सी
      तुम्हारा  मन जब तब रोकता मुझसे इन्हीं अनकहे सवालों
      के ज़वाब के लिए
     तुम बहाने से बात करतीं
    स्वपन-प्रिया आओ एक सच से मिला दूं तुमको
    वो नरमदा है न
    उसके दो किनारे से हम तुम कभी न मिल सकेंगें
   बस यही है प्रेम तपस्या तापसी
  इस प्रेम को देह न जोड़ सकूंगा...
  कोई नाम देकर तुमसे रिश्ता न जोड़ सकूंगा
  इस बेनामी रिश्ते के सहारे
चलो एक बार फिर से अदेह सवालों को
जप्त करें हम तुम !



12 टिप्‍पणियां:

  1. कोई नाम देकर तुमसे रिश्ता न जोड़ सकूंगा
    इस बेनामी रिश्ते के सहारे
    चलो एक बार फिर से अदेह सवालों को
    जप्त करें हम तुम !

    Aadarniya....Girish ji....

    aapki in panktiyon ne man moh lia....

    bahut hi behtareen prastuti......

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  2. बस यही है प्रेम तपस्या तापसी
    इस प्रेम को देह न जोड़ सकूंगा...
    प्रेम तपस्या की पराकाष्ठा --

    अदेह प्रेम --

    वाह बहुत सुन्दर

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  3. वाह गिरिश भाई, ये बात हुई न!! एक बहुत उतकृष्ट रचना-सुन्दर अहसास!

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  4. प्रेम के ऊँचाईयों को छूने वाली पंक्तियाँ गिरीश भाई।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  5. चलो एक बार फिर से अदेह सवालों को

    जप्त करें हम तुम !

    प्रेम का बहुत सुन्दर वर्णन ....बहुत बहुत बधाई

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  6. ये इश्क नहीं आसां
    बस इतना समझ
    लीजै इक आग का दरिया है
    सत्य-स्थिति पर आधारित कविता
    को आपकी टिप्पणीयां मिली शुक्रिया

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  7. चाचा सही में ऐसा हुआ .?
    अब हो गए आप बावरे-फ़कीरा

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  8. Reem ke kitne pahloo hote hain .. aapne bhi anmol prem ki uchaaiyon ko choo liye hai in panktiyon mein ...

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  9. एक हृदयस्पर्शी, अत्यंत सुन्दर भावों से लबरेज़ रचना, मुकुल भाई। अहा!

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