शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

प्रीत निमंत्रण ..!

गूगल से साभार 
प्रिया,सहज ही तुमने क्योंकर
भेजा मुझ तक  प्रीत निमंत्रण ..!
*********************
मैं  विरही हूँ तुम प्रतिबंधित
हर आहट पे हुए  सशंकित
चिंता भरे हरेक पल मेरे
मन बिसरा करना अब चिंतन !
हूक उभरती तुम्हें याद कर 
 बिना मिलन हर जीत विसर्जन  !
प्रिया,सहज ही तुमने क्योंकर
भेजा मुझ तक  प्रीत निमंत्रण ..!
********************* 
तुम्हें खोजतीं आंखें मेरी
टकटक शशि की ओर निहारें  !
तुम उस पथ से आतीं होगी  ,
सोच के अँखियाँ पंथ-बुहारें !
तुम संयम की सुदृढ़ बानगी
मैं संयम से सदा अकिंचन  !
प्रिया,सहज ही तुमने क्योंकर
भेजा मुझ तक  प्रीत निमंत्रण ..!

*********************

19 टिप्‍पणियां:

  1. वैसे तो मुझे कविता की कुछ ज़्यादा समझ नहीं है लेकिन फिर भी आपको पढना अच्छा लगा

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  2. वाह...प्रिया के स्नेह निमंत्रण की ऐसी प्रतिक्रिया कि क्मस्तिष्क में सवाल उभर रहे हैं....बहुत खूब।

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  3. अजित भैया
    कालेज के दिनों की घटना है
    आज याद आ गई सो लिख दिया
    पधारने का आभार

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  4. ये क्या चक्कर है जी
    करवा चौथ का
    वृत किया मैं तुम हो की ...?

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  5. गिरीश भाई...अच्छा लिखा. ग़ज़ब की सरसता है...अब देखना है कि भाभी का बेलन बरसता है या नहीं....!

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  6. भैया साथ में बैठी थीं
    गुस्से से उठ गईं
    अब मैं भी चला

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  7. मैं विरही हूँ तुम प्रतिबंधित
    हर आहट पे हुए सशंकित
    तुम संयम की सुदृढ़ बानगी
    मैं संयम से सदा अकिंचन !
    संयमित प्रतिबन्ध लिखवा ही देता है ऐसी सुन्दर रचना ..!!

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  8. bबहुत् सुन्दर स्नेह निमन्त्रण बधाई

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  9. मैं विरही हूँ तुम प्रतिबंधित
    हर आहट पे हुए सशंकित

    kya baat hai! ati sundar.

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  10. सुन्दर प्रणय रचना है ...........
    ये दीपावली आपके जीवन में नयी नयी खुशियाँ ले कर आये .........
    बहुत बहुत मंगल कामनाएं .........

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  11. टकटक शशि की ओर निहारें !

    तुम उस पथ से आतीं होगी ,

    सोच के अँखियाँ पंथ-बुहारें !

    तुम संयम की सुदृढ़ बानगी

    मैं संयम से सदा अकिंचन !

    प्रिया,सहज ही तुमने क्योंकर

    भेजा मुझ तक प्रीत निमंत्रण ..!

    क्या संयामियों के बीच प्रीत निमंत्रण नहीं भेजा जाता ......???

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  12. हकीर जी
    सादर अभिवादन
    संयम से जो सदा अकिंचन [गरीब] हो उसे
    प्रीत निमंत्रण "?
    मैं संयम से सदा अकिंचन !
    प्रिया,सहज ही तुमने क्योंकर..?
    नारी मन की सहजता
    कभी कभी उसकी कमजोरी बन जाती
    है यही आधार है इस गीत का

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  13. तुम्हें खोजतीं आंखें मेरी
    टकटक शशि की ओर निहारें !
    तुम उस पथ से आतीं होगी ,
    सोच के अँखियाँ पंथ-बुहारें !nice

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  14. अर्थ स्पष्ट करने के लिए शुक्रिया .....

    ये 'बेलन' तो मैं देखा ही नहीं था ....!!

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  15. भाई वाह बहुत खूबसूरत हिंदी गीत.....

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  16. बहुत ही सुंदर रचना । अधिक तर लोगों की कहानी बहुत ही भावपूर्ण और छंदमय शब्दों में साकार की है आपने ।

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